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30 जून 2020

राजस्थान में किसान आंदोलन - RajGkTopic

  राजस्थान में प्रमुख किसान आंदोलन - ( Rajasthan me kishan andolan )


    राजस्थान में किसान आंदोलन ( Farmer movement in Rajasthan ) किसानों पर हो रहे अत्याचार एवं शोषण से छुटकारा पाने के लिए किया गया एक लंबा संघर्ष है। राजस्थान में उस समय के जागीरदारों या शासकों ने किसानों पर अनेक प्रकार के कर लगा दिए थे।

विभिन्न रियासतों की जागीरदारों द्वारा विभिन्न प्रकार के लाग-बाग , बेगारी, मृत्यु भोज तथा अन्य कर एवं शुल्क के रूप में किसानों का लगातार शोषण व अत्याचार किया जा रहा था।

किसानों ने इन करों एवं शुल्कों का विरोध किया। परिणाम स्वरूप राजस्थान में अनेक किसान आंदोलन हुए। इस लेख में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए राजस्थान के किसान आंदोलन से संबंधित सारगर्भित जानकारी देने का प्रयास किया गया है।



 
राजस्थान-में-किसान-आंदोलन
राजस्थान में किसान आंदोलन



बिजौलिया किसान आंदोलन - [1897-1941 ]


    राजस्थान का पहला संगठित किसान आंदोलन बिजोलिया किसान आंदोलन था। यह आंदोलन 1897 ईस्वी में भीलवाड़ा के बिजौलिया नामक स्थान के धाकड़ जाति के किसानों ने प्रारंभ किया था। वहां के जागीरदार उस समय राव कृष्णसिंह थे।बिजौलिया की स्थापना अशोक परमार द्वारा की गई थी।


बिजौलिया को रियासत काल में ऊपरमाल के नाम से भी जाना जाता था। इस ठिकाने में भू राजस्व का निर्धारण करना एवं उसके संग्रह की पद्धति बिजौलिया किसान आंदोलन का मुख्य मुद्दा थी।

बिजौलिया का वास्तविक नाम विजयवल्ली था जो बाद में बिजोल्ली और फिर बिजौलिया हो गया था। बिजोलिया मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। इस ठिकाने का संस्थापक अशोक परमार था जो मूल रूप से भरतपुर रियासत के जगनेर का रहने वाला था।

राव कृष्णसिंह ने बिजौलिया के किसानों से 84 प्रकार की लाग - बाग लेना प्रारंभ कर दिया था। भू राजस्व निर्धारण एवं संग्रह की पद्धति लाटा एवं कूंता तथा भारी संख्या में लाग-बाग तथा जागीरदारों के अत्याचार इस आंदोलन के मुख्य कारण थे।

राव कृष्णसिंह ने 1903  ईस्वी में चंवरी कर लगा दिया। जो भी व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह करता उसे ठिकाने में कर के रूप में ₹5 जमा कराने होते थे। चंवरी कर का संबंध कन्या विवाह से है।

1906 ईस्वी में राव पृथ्वीसिंह द्वारा तलवार बंधाई नामक नया कर लगा दिया। यह नए जागीरदार के उत्तराधिकार के रूप में राज्य द्वारा लिया जाने वाला उत्तराधिकार शुल्क था।

1916 ईस्वी में विजय सिंह पथिक ने साधु सीताराम दास के आग्रह पर बिजौलिया किसान आंदोलन की बागडोर संभाली।

विजय सिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश ) के रहने वाले थे।विजय सिंह पथिक ने 1917 में ऊपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना की साथ ही श्री मन्ना पटेल को इसका सरपंच बनाया।


बिजोलिया के किसानों की मांगों के औचित्य की जांच करने के लिए अप्रैल 1919 में न्यायमूर्ति बिंदु लाल भट्टाचार्य जांच आयोग गठित हुआ जिसमें विभिन्न कर एवं लाग - बाग ( एक प्रकार का कर ) को समाप्त करने की अनुशंसा की लेकिन मेवाड़ राज्य ने कोई निर्णय नहीं लिया। किसानों ने लगान एवं करों का भुगतान बंद कर दिया।

विजय सिंह पथिक ने कानपुर से प्रकाशित प्रताप नामक समाचार पत्र के माध्यम से इस आंदोलन को लोकप्रिय बना दिया। 1920 में विजय सिंह पथिक ने पहले वर्धा और फिर अजमेर से राजस्थान केसरी नामक पत्र का प्रकाशन किया।

1922 में राजस्थान सेवा संघ ने नवीन राजस्थान समाचार पत्र प्रारंभ किया जिसने बिजोलिया , बेंगू के किसान आंदोलन तथा भोमट के भील आंदोलन का समर्थन किया था। 1923 में यह बंद हो गया लेकिन तरुण राजस्थान के नाम से इसका इसका पुन: प्रकाशन हुआ।

1927 ईस्वी में विजय सिंह पथिक इस आंदोलन से अलग हो गए तथा आंदोलन का नेतृत्व माणिक्य लाल वर्मा , सेठ जमनालाल बजाज और हरीभाऊ उपाध्याय द्वारा किया गया। 

यह भारत का प्रथम अहिंसात्मक किसान आंदोलन था जो लगातार 44 वर्षों तक चला था। यह आंदोलन 1897 से प्रारंभ होकर 1941 तक चला था। 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. विजय राघवाचार्य के बनने पर आंदोलन का समापन हुआ। 


श्री माणिक्य लाल वर्मा के नेतृत्व में किसानों की मांगें मानकर उनकी जमीन वापस दिलवा दी। यह आंदोलन तीन चरणों में विभाजित किया गया है।  प्रथम चरण - 1897 -1915  , द्वितीय चरण 1916-1922 और तृतीय चरण 1923 - 1941 तक माना  गया है। 



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अलवर किसान आंदोलन -


                  अलवर रियासत में शिकार करने के लिए जंगली सूअरों को पाला जाता था। लेकिन ये सूअर किसानों की फसल को नुकसान पहुंचाते थे।

1923-24 . में अलवर के महाराजा जयसिंह द्वारा लगान बढ़ा दिया गया। इसके विरोध स्वरूप 14 मई 1925 को अलवर के बानसूर इन थानागाजी क्षेत्र के लगभग 800 किसान अलवर के नीमूचणा गांव में एकत्रित हुए।


नीमूचणा की सभा में उपस्थित लोगों पर सैनिकों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी जिससे सैकड़ों लोग मारे गए। इस हत्याकांड का वास्तविक दोषी गोपाल दास नामक पंजाबी अधिकारी को माना जाता है।

महात्मा गांधी जी ने अपने पत्र यंग इंडिया में इस घटना को   Dyrism Double Distilled  की संज्ञा देते हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी अधिक वीभत्स बताया।

सरकार को झुकना पड़ा और लगान की दरों में कमी के साथ ही यह आंदोलन समाप्त हो गया।

मारवाड़ किसान आंदोलन-


1920 ईस्वी में जयनारायण व्यास ने मारवाड़ हितकारिणी सभा का गठन किया तथा इसके माध्यम से किसानों की समस्याओं के प्रति सक्रिय जनमत तैयार हुआ। जय नारायण व्यास ने अपने तरुण राजस्थान नामक समाचार पत्र के माध्यम से किसानों की दुर्दशा तथा जागीरदारों के जुल्मों का पर्दाफाश किया।

13 मार्च 1947 को मारवाड़ के नागौर क्षेत्र के डाबड़ा गांव में मारवाड़ लोग परिषद के कार्यकर्ताओं तथा किसानों के शांतिपूर्ण जुलूस पर हमला कर दिया। डाबड़ा हत्याकांड की चारों तरफ निंदा हुई।

बेगूं किसान आंदोलन -


       बेंगू  नामक स्थान वर्तमान में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। सत्ता ने अपना दमन चक्कर प्रजा पर चलाना शुरु कर दिया। बेंगू किसान आंदोलन का नेतृत्व विजय सिंह पथिक के निर्देशन पर रामनारायण चौधरी  द्वारा किया गया था। 

बिजौलिया किसान आंदोलन से प्रेरित होकर यहां के किसानों ने 1921 ईस्वी में भीलवाड़ा के मेनाल नामक स्थान पर एकत्रित होकर अपनी मांगों को मनवाने के लिए आंदोलन करने का कठोर निर्णय ले लिया था।

दो वर्ष की टकराहट के बाद ठाकुर अनूप सिंह ने समझौता किया लेकिन राजस्थान सेवा संघ और ठाकुर अनूप सिंह के मध्य हुए समझौते को बोल्शैविक फैसले की संज्ञा दी गई।

बेंगू किसान आंदोलन की शिकायतों की जांच के सिलसिले में सरकार ने अपने बंदोबस्त अधिकारी मिस्टर ट्रेंच को भेजा था लेकिन किसानों ने ट्रेंच कमीशन का विरोध किया।

किसानों की इस अहिंसक सभा पर 13 जुलाई 1923 ईस्वी को ट्रेंच के आदेश पर लाठीचार्ज गोलियां चलाई गई जिसमें रूपाजी एवं कृपाजी नामक दो किसान शहीद हो गए थे।

इसके पश्चात इस किसान आंदोलन की बागडोर विजय सिंह पथिक ने संभाल ली थी। 

शेखावाटी का किसान आंदोलन-


महात्मा गांधी के 1920 के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर शेखावाटी क्षेत्र में किसान हरलाल सिंह ने किसानों को संगठित कर करने एवं चेतना जागृत करने हेतु किसान पंचायतों का गठन किया।

शेखावाटी के कटराथल गांव में अप्रैल 1934 में हरलाल सिंह की पत्नी किशोरी देवी के नेतृत्व में हजारों जाट महिलाओं ने किसान आंदोलन में भाग लिया था। शेखावाटी का किसान आंदोलन 1925 में शुरू हुआ और 1946 में श्री हीरालाल शास्त्री के माध्यम से समाप्त हुआ।

बूँदी किसान आंदोलन-

             बूँदी किसान आंदोलन राज्य प्रशासन के विरुद्ध था जो 1922 में पहली बार शुरू किया गया था। यहां के किसानों ने राजस्थान  सेवासंघ के कार्यकर्ता पंडित नयनू राम शर्मा के नेतृत्व में लाग-बाग , बेगार प्रथा एवं उनकी लगान की दरों के विरोध में यह किसान आंदोलन प्रारंभ किया। 


इस किसान आंदोलन में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 23 जून,1923 ईस्वी में डाबी नामक स्थान पर किसानों का सम्मेलन हो रहा था जहां पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें नानक जी भील शहीद हो गए।



दूधवाखारा किसान आंदोलन - यह किसान आंदोलन बीकानेर रियासत से संबंधित है।

मेव किसान आंदोलन -


अलवर -भरतपुर क्षेत्र के किसानों से संबंधित है। मेवात क्षेत्र के मेव किसानों ने 1932 में डॉक्टर मोहम्मद अली के नेतृत्व में इस आंदोलन को शुरू किया था।


राजस्थान के किसान आंदोलन से सम्बंधित अन्य जानकारी  -


    ऊपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना विजय सिंह पथिक के द्वारा की गई थी।

● दूधवाखारा आंदोलन का नेतृत्व वैद्य मगाराम, हनुमान सिंह आर्य, रघुवर दयाल गोयल आदि ने नेतृत्व प्रदान किया था।

● दूधवाखारा आंदोलन का संबंध बीकानेर रियासत से है।

नानक जी भील का संबंध बूंदी किसान आंदोलन से है

चंवरी कर कन्या विवाह पर लगाए जाने वाला कर था

तलवार बंधाई एक प्रकार का कर था। यह कर बिजौलिया के राव पृथ्वीसिंह द्वारा लगाया गया था यह वास्तविक रूप में उत्तराधिकार के रूप में लिया जाने वाला शुल्क था।

● बिजौलिया किसान आंदोलन 44 वर्षों तक चला था।

प्रताप नामक समाचार पत्र कानपुर से प्रकाशित होता था।

ट्रेंच कमीशन का संबंध बेगूं किसान आंदोलन से है

रूपाजी एवं कृपाजी नामक किसानों का संबंध बेंगू किसान आंदोलन से है।

कूदन गांव का हत्याकांड इतना वीभत्स था कि ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ कॉमंस सदन में भी इस पर चर्चा हुई।

  • मारवाड़ हितकारिणी सभा के संस्थापक जयनारायण व्यास थे।
  • नीमूचाणा को अलवर किसान आंदोलन के संदर्भ में याद किया जाता है। 

  • डूंगरजी व जवाहरजी का संबंध सीकर जिले से है। 





              इस प्रकार आज हमने राजस्थान के किसान आंदोलनों से संबंधित सारगर्भित जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया है। स्वतंत्रता के बाद जागीरदारी उन्मूलन कानून आदि बने, जिससे कई वर्षों से चली रही सामंती व्यवस्था का अंत हो गया और किसान अपनी भूमि के वास्तविक स्वामी बन गए। 


राजस्थान में प्रमुख किसान आंदोलन की जानकारी हमने प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए बहुत ही अच्छे ढंग से आप तक पहुंचाने का प्रयास किया है। आशा है किसान आंदोलन की जानकारी आपको बहुत ही अच्छी लगी है।




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