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27 अप्रैल 2026

अप्रैल 27, 2026

देवसेना का गीत पाठ की संपूर्ण व्याख्या

  देवसेना का गीत पाठ की संपूर्ण व्याख्या, प्रसंग और काव्य-सौंदर्य -

https://rajgktopic.blogspot.com/2026/04/devsena-ka-geet.html
devsena-ka-geet


संदर्भ

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'स्कंदगुप्त' के एक अंश से ली गई हैं। यह हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' भाग-2 में 'देवसेना का गीत' शीर्षक से संकलित है।

प्रसंग

देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है। उसने अपना पूरा जीवन स्कंदगुप्त के प्रेम की प्रतीक्षा में बिता दिया, लेकिन उसे असफलता मिली। अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर, जब वह पूरी तरह थक चुकी है और स्कंदगुप्त उसके पास प्रेम का प्रस्ताव लेकर आता है, तब वह उसे ठुकराते हुए अपने संघर्षपूर्ण जीवन की याद में यह गीत गा रही है।

व्याख्या (एक-एक पंक्ति के भाव के साथ)

  • आह! वेदना मिली विदाई! / मैंने भ्रमवश जीवन-संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई।  
  • देवसेना अत्यंत  भावुक होकर कहती है कि आज मेरे जीवन का अंतिम समय है और मुझे केवल पीड़ाओं (वेदना) के साथ विदा मिल रही है। वह पछताते हुए कहती है कि मैंने स्कंदगुप्त के प्रेम के 'भ्रम' में पड़कर अपनी जीवन भर की खुशियों और भावनाओं की पूँजी को 'भिक्षा' (मधुकरियों) की तरह व्यर्थ ही लुटा दिया।

छलछलाते थे श्रम-कण मेरे, भाग्य-कणों से गिरते थे वे, / मेरी नीरवता अनंत की, अंगड़ाई-सी लेती थी।

उसने जीवन भर जो संघर्ष किया, उससे उसकी आँखों में हमेशा पसीने की बूंदों की तरह आँसू (श्रम-कण) झलकते रहे। उसे ऐसा लगा मानो उसका भाग्य हमेशा उससे रूठा रहा। उसका जीवन इतना अकेला था कि सन्नाटा (नीरवता) ही मानो उसका एकमात्र साथी बनकर अंगड़ाई ले रहा था।
  • श्रमित स्वप्न की मधुमाया में, गहन-विपिन की तरु-छाया में, / पथिक उनींदी श्रुति में किसने, यह विहाग की तान उठाई?
     जैसे कोई थका हुआ यात्री (पथिक) घने जंगल में पेड़ की छाया में सोकर मीठा सपना देख रहा हो, देवसेना ने भी अपने कठिन जीवन में प्रेम के सपने देखे थे। लेकिन अब जब वह हार चुकी है, तब स्कंदगुप्त का प्रेम-प्रस्ताव उसे वैसा ही दुख दे रहा है जैसे कोई गहरी नींद में डूबे व्यक्ति को आधी रात का वियोग भरा संगीत (विहाग) सुना दे।
  • लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी, रही बचाए फिरती कबकी, / मेरी वैयक्तिक लज्जा भी, आज हुई है अब विदाई।
    जब देवसेना युवा थी, तब सबकी प्यासी और लालच भरी नजरें (सतृष्ण दीठ) उस पर टिकी रहती थीं। उसने बड़ी मुश्किल से खुद को दुनिया की उन नजरों से बचाया था। पर आज वह कहती है कि जिसके लिए उसने सब कुछ सहा, वही प्रेम न मिलने पर उसकी लज्जा और संकोच भी अब उससे विदा ले रहे हैं।
  • चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर, प्रलय चल रहा अपने पथ पर, / मैंने निज दुर्बल पद-बल पर, उससे हारी-होड़ लगाई।
    उसे महसूस हो रहा है कि मृत्यु (प्रलय) उसके जीवन-रूपी रथ पर सवार होकर उसके साथ चल रही है। वह जानती है कि वह कमजोर है, फिर भी वह अपने दुर्बल पैरों के दम पर उस प्रलय (मृत्यु/दुख) से ऐसी प्रतियोगिता (होड़) कर रही है जिसमें उसकी हार निश्चित है।
  • लौटा लो यह अपनी थाती, मेरी करुणा हा-हा खाती, / विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे, इससे मन की लाज गँवाई।
    अंत में वह संसार (स्कंदगुप्त) से कहती है कि अपनी यह प्रेम की अमानत (थाती) वापस ले लो। मेरा हृदय अब करुणा से इतना भर चुका है कि वह अब इस प्रेम का भार नहीं उठा सकता। इसी प्रेम की उम्मीद में मैंने अपने मन की शांति और अपनी लाज सब कुछ गँवा दी है।

विशेष (काव्य सौंदर्य

  1. भाषा: तत्सम प्रधान संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग है।
  2. रस: पूरी कविता में करुण रस और विरह की वेदना है।
  3. अलंकार: 'जीवन-रथ' में रूपक, 'नीरवता की अंगड़ाई' और 'प्रलय' में मानवीकरण अलंकार है।
  4. भाव: यह गीत देवसेना के अटूट स्वाभिमान और उसके जीवन के खालीपन का मार्मिक चित्रण है।

पाठ 'देवसेना का गीत' पर आधारित महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर यहाँ दिए गए हैं:

प्रश्न 1: देवसेना ने अपनी 'जीवन-संचित मधुकरियों की भीख' क्यों लुटा दी?
उत्तर: देवसेना ने अपना पूरा जीवन स्कंदगुप्त के प्रेम के इंतज़ार में बिता दिया। उसने अपने जीवन की सुख-सुविधाओं और भावनाओं को केवल एक उम्मीद (भ्रम) के सहारे संचित किया था। लेकिन जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसे एहसास हुआ कि उसका प्रेम सफल नहीं हुआ, तो उसे लगा कि उसने अपनी अमूल्य भावनाओं की पूँजी को 'भिक्षा' (मधुकरियों) की तरह व्यर्थ ही लुटा दिया है।
प्रश्न 2: 'विहाग की तान' से क्या तात्पर्य है? देवसेना के संदर्भ में इसका क्या महत्व है?
उत्तर: 'विहाग' वह राग है जो आधी रात को वियोग की अवस्था में गाया जाता है।
देवसेना जब दुखों से थक चुकी थी और एकांत चाहती थी, तब स्कंदगुप्त उसके पास प्रेम का प्रस्ताव लेकर आता है। देवसेना को उसका यह असमय प्रेम का प्रस्ताव वैसा ही दुखदायी लगता है जैसे कोई गहरी नींद में सोए हुए थके यात्री के कान में विछोह का संगीत (विहाग) सुना दे।
प्रश्न 3: 'चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर, प्रलय चल रहा अपने पथ पर'—इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का भाव यह है कि देवसेना का जीवन अब विनाश और मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। 'प्रलय' उसके जीवन रूपी रथ पर सवार है, जिसका अर्थ है कि उसके जीवन में केवल दुख और अंत ही शेष है। वह जानते हुए भी कि वह कमजोर है, अपने जीवन के संघर्षों से हार नहीं मानती और मृत्यु (प्रलय) से मुकाबला करती रहती है।
प्रश्न 4: देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?
उत्तर: देवसेना की निराशा के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
  1. हूणों के आक्रमण में उसके पूरे परिवार (मालवा के राजपरिवार) का मारा जाना।
  2. स्कंदगुप्त द्वारा उसके प्रेम को ठुकरा देना और विजया के प्रति आकर्षित होना।
  3. जीवन भर गरीबी और अकेलेपन में संघर्ष करना।
प्रश्न 5: 'लौटा लो यह अपनी थाती'—कहकर देवसेना क्या संकेत देना चाहती है?
उत्तर: यहाँ 'थाती' का अर्थ 'धरोहर' या 'अमानत' है। देवसेना स्कंदगुप्त से कहती है कि तुम अपना यह प्रेम का प्रस्ताव और मेरी पुरानी यादें वापस ले लो। अब मेरा हृदय इतना करुण और थका हुआ है कि वह इस प्रेम का भार और अधिक नहीं सँभाल सकता। वह अपनी 'लाज' और शांति को और अधिक दांव पर नहीं लगाना चाहती।
प्रश्न 6: 'देवसेना का गीत' में निहित मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: यह गीत संघर्ष, साहस और स्वाभिमान का संदेश देता है। यह दिखाता है कि एक व्यक्ति जीवन में सब कुछ हारने और असफल होने के बाद भी अपने स्वाभिमान को कैसे बचाए रख सकता है। देवसेना का अंतिम समय में स्कंदगुप्त के प्रस्ताव को ठुकराना उसके चरित्र की दृढ़ता को दर्शाता है।

1. भाव-सौंदर्य (भाव पक्ष)

  • निराशा और वेदना: पूरी कविता में एक ऐसी स्त्री की मानसिक स्थिति का चित्रण है जो जीवन के अंतिम मोड़ पर खड़ी है और पीछे मुड़कर देखने पर उसे केवल संघर्ष और असफलता ही दिखती है।
  • स्वाभिमान: देवसेना हारने के बावजूद स्कंदगुप्त के प्रेम-प्रस्ताव को ठुकरा देती है। वह नहीं चाहती कि जिस प्रेम को उसने जीवन भर जिया, उसे अंत में 'दया' के रूप में स्वीकार करे।
  • मानवीय संघर्ष: कविता दिखाती है कि मनुष्य का भाग्य (प्रलय) कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, मनुष्य अपनी 'दुर्बल पद-बल' (कमजोर पैरों) से भी उससे लड़ने का साहस रखता है।

2. शिल्प-सौंदर्य (कला पक्ष)

  • भाषा: कवि जयशंकर प्रसाद ने तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया है। भाषा में गंभीरता और प्रवाह है।
  • शैली: यह एक छायावादी कविता है, जिसमें प्रतीकों और बिंबों (Images) का सहारा लिया गया है।
  • रस: मुख्य रूप से करुण रस और विप्रलंभ श्रृंगार (वियोग श्रृंगार) का मिश्रण है।
  • गुण: इसमें प्रसाद गुण और माधुर्य गुण की प्रधानता है।

3. प्रमुख अलंकार (व्याकरण)

  • मानवीकरण अलंकार:
    • "मेरी नीरवता अनंत की, अंगड़ाई-सी लेती थी" (मौन को अंगड़ाई लेते दिखाया गया है)।
    • "प्रलय चल रहा अपने पथ पर" (प्रलय/विनाश को एक पथिक की तरह चलता दिखाया गया है)।
  • रूपक अलंकार:
    • "जीवन-रथ" (जीवन रूपी रथ)।
    • "श्रम-कण" (पसीने की बूंदें जो आँसू के रूप में हैं)।
  • उपमा अलंकार:
    • "अंगड़ाई-सी" (सी शब्द के कारण)।
    • "लघु सुरधनु से पंख" (इंद्रधनुष जैसे पंख)।
  • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार:
    • "हा-हा" (एक ही शब्द की आवृत्ति)।

आशा है आपको देवसेना का गीत पाठ की व्याख्या प्रश्न उत्तर की जानकारी अच्छी लगी है ।

कार्नेलिया का गीत पाठ के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें -


                          👉👉    कार्नेलिया का गीत -





अप्रैल 27, 2026

कार्नेलिया का गीत

कार्नेलिया का गीत -

 जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक 'चंद्रगुप्त' का प्रसिद्ध अंश 'कार्नेलिया का गीत' भारत की गौरवगाथा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्रण है। इसकी सप्रसंग व्याख्या नीचे दी गई है:

1. संदर्भ

यह काव्यांश छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त' से उद्धृत है। यह कविता कक्षा 12 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' में संकलित है।

2. प्रसंग

सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के तट पर यूनानी शिविर के पास बैठी है। वह भारत की प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ की संस्कृति और लोगों की उदारता से इतनी प्रभावित है कि वह भारत को अपना देश मानने लगती है और उसकी प्रशंसा में यह गीत गाती है।

3. व्याख्या

  • अरुण यह मधुमय देश हमारा: कार्नेलिया कहती है कि हमारा भारत देश लालिमा (सूर्योदय) से भरा हुआ और अत्यंत मधुर है। यहाँ सूर्य की पहली किरण पहुँचती है, जो ज्ञान और सभ्यता का प्रतीक है।

  • जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा: भारत की विशालता और उदारता ऐसी है कि यहाँ दूर-देश से आए अनजान लोगों और शरणार्थियों को भी प्रेमपूर्वक आश्रय मिलता है।

  • सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर: सुबह के समय तालाबों में खिले कमलों की चमक और पेड़ों की फुनगियों (ऊपरी शाखाओं) पर नाचती हुई सूर्य की किरणें अत्यंत मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करती हैं।

  • लघु सुरधनु से पंख पसारे... उड़ते खग जिस ओर मुँह किए: रंग-बिरंगे पक्षी अपने छोटे-छोटे इंद्रधनुषी पंख फैलाकर मलय पर्वत से आने वाली शीतल सुगंधित हवा के सहारे जिस ओर उड़ रहे हैं, वे भारत को ही अपना प्यारा घोंसला (घर) समझते हैं।

  • बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल: भारत के लोगों के हृदय करुणा और सहानुभूति से भरे हैं। दूसरों के दुख को देखकर उनकी आँखों से आँसू इस तरह बहते हैं जैसे बादल से वर्षा होती है।

  • हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे: सुबह के समय 'उषा' रूपी नायिका सूर्य रूपी सुनहरे कलश में सुख और समृद्धि भरकर भारत की धरती पर बिखेर देती है, जिससे चारों ओर प्रसन्नता छा जाती है।

  • मदिर ऊँघते रहते जब जगकर, रजनी भर तारा: रात भर जागने के बाद सुबह होने पर तारे ऐसे लगते हैं जैसे वे अब नींद में ऊँघ रहे हों, और विदा ले रहे हों।

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4. काव्य सौंदर्य (विशेष)

  • भाषा: तत्सम प्रधान खड़ी बोली, जो सरल और प्रवाहमयी है।

  • शैली: गेय शैली (गाया जाने योग्य गीत)।

  • अलंकार: 'उषा' का मानवीकरण किया गया है (मानवीकरण अलंकार)। 'लघु सुरधनु' में उपमा अलंकार है।

  • भाव: राष्ट्रप्रेम, शरणागत वत्सलता और प्रकृति के प्रति अनुराग झलकता है। 


दूसरे शब्दों में कार्नेलिया का गीत पाठ का सार -



जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'कार्नेलिया का गीत' की संपूर्ण व्याख्या, व्यवस्थित रूप में यहाँ दी गई है:

1. कविता (मूल पाठ)

अरुण यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।

छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।

लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।

लहरें टकरातीं अनंत की, पाकर जहाँ किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब जगकर, रजनी भर तारा।


2. प्रसंग

प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त' से ली गई हैं। सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे बैठी है। वह भारत की अनुपम प्राकृतिक छटा, यहाँ की गौरवशाली संस्कृति और उदार मानवीय मूल्यों को देखकर मंत्रमुग्ध है और इसी भाव में यह गीत गाती है।


3. संपूर्ण व्याख्या

  • भारत की उदारता: कार्नेलिया कहती है कि हमारा भारत देश सूर्य की लालिमा (ज्ञान) से भरा हुआ और अत्यंत मधुर है। इस देश की विशेषता यह है कि यहाँ दूर-देश से आने वाले अनजान यात्रियों और शरणार्थियों को भी प्रेमपूर्वक आश्रय मिलता है। जिस तरह क्षितिज का अंत नहीं मिलता, वैसे ही भटकते हुए लोगों को भारत में आकर शांति मिलती है।


  • प्राकृतिक सौंदर्य: सुबह के समय तालाबों में खिले हुए कमलों की पराग रूपी चमक पर पेड़ों की चोटियाँ नाचती हुई प्रतीत होती हैं। धरती पर चारों ओर फैली हरियाली ऐसी लगती है मानो किसी ने शुभ कुंकुम (रोली) बिखेर दिया हो, जो जीवन में मंगल का प्रतीक है।


  • अतिथि सत्कार और अपनत्व: छोटे-छोटे इंद्रधनुषी पंख फैलाकर पक्षी मलय पर्वत से आने वाली शीतल सुगंधित हवा के सहारे जिस दिशा में उड़ रहे हैं, वह भारत ही है। वे पक्षी भी भारत को अपना प्यारा घोंसला (घर) मानकर यहाँ खिंचे चले आते हैं। यह संकेत है कि विदेशी भी यहाँ आकर बसना चाहते हैं।


  • करुणा और सहानुभूति: यहाँ के लोगों के हृदय करुणा से भरे हैं। दूसरों के दुखों को देखकर उनकी आँखों में करुणा के वैसे ही बादल उमड़ पड़ते हैं जैसे बारिश की बूंदें गिरती हैं। यहाँ तक कि समुद्र की अनंत लहरें भी भारत के किनारों से टकराकर शांत हो जाती हैं, अर्थात यहाँ सबको शांति और स्थिरता मिलती है।


  • मनोहारी सुबह: सुबह के समय जब आकाश में तारे रात भर जागने के बाद आलस में ऊँघने लगते हैं, तब 'उषा' (भोर) रूपी नायिका सूर्य रूपी सुनहरे कलश (हेम कुंभ) में सुख-समृद्धि भरकर भारत की धरती पर लुढ़का देती है। आशय यह है कि भारत में हर सुबह सुख और आनंद लेकर आती है।

4. विशेष (काव्य सौंदर्य)

  1. भाषा: संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है, जो अत्यंत प्रवाहपूर्ण है।

  2. मानवीकरण अलंकार: 'उषा' को नायिका के रूप में और 'तारा' को ऊँघते हुए दिखाकर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।

  3. रूपक और उपमा: 'हेम कुंभ' (सुनहरा घड़ा) में रूपक और 'लघु सुरधनु से पंख' में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

  4. बिंब विधान: कवि ने दृश्य बिंबों के माध्यम से प्रकृति का सजीव चित्र खींचा है।

  5. राष्ट्रीय भावना: यह गीत भारत की विश्व-बंधुत्व की भावना और उदारता का परिचय देता है।

पाठ 'कार्नेलिया का गीत' पर आधारित महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:

प्रश्न 1: 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' पंक्ति में भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से भारत की निम्नलिखित विशेषताओं को बताया गया है:
  • प्राकृतिक सौंदर्य: भारत का सूर्योदय अत्यंत सुंदर और लालिमा (अरुण) से भरा है।
  • मिठास और अपनापन: यहाँ की संस्कृति और व्यवहार में मधुरता (मधुमय) है।
  • ज्ञान का प्रतीक: सूर्य की पहली किरण यहीं आती है, जो भारत को ज्ञान का केंद्र बताती है।
प्रश्न 2: 'उड़ते खग' और 'बरसाती आँखों के बादल' में क्या काव्यगत अर्थ छिपा है?
उत्तर:
  • उड़ते खग: यहाँ पक्षी उन विदेशी लोगों के प्रतीक हैं जो शांति और प्रेम की तलाश में भारत आते हैं और इसे अपना घर (नीड़) मानते हैं।
  • बरसाती आँखों के बादल: इसका अर्थ है कि भारत के लोग दूसरों के कष्टों को देखकर दुखी हो जाते हैं। उनकी आँखों में करुणा का जल रहता है, जो उन्हें संवेदनशील बनाता है।
प्रश्न 3: 'जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा'—इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का भाव यह है कि भारत एक अत्यंत उदार देश है। यहाँ केवल जान-पहचान वालों को ही नहीं, बल्कि उन अनजान लोगों को भी आश्रय और सहारा दिया जाता है जिन्हें दुनिया में कहीं और जगह नहीं मिलती। यह भारत की 'अतिथि देवो भव:' की भावना को दर्शाता है।
प्रश्न 4: कवि ने 'हेम कुंभ ले उषा सवेरे' क्यों कहा है?
उत्तर: कवि ने उषा (भोर) का मानवीकरण किया है। यहाँ सूर्य को 'सुनहरा घड़ा' (हेम कुंभ) कहा गया है। जैसे कोई स्त्री घड़े से पानी छिड़कती है, वैसे ही उषा रूपी नायिका सूर्य की सुनहरी किरणों के माध्यम से भारत की धरती पर सुख और समृद्धि बिखेर देती है।
प्रश्न 5: कविता में व्यक्त प्रकृति चित्रण को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: कविता में प्रकृति का अत्यंत मनमोहक चित्रण है। सुबह के समय कमलों पर सूर्य की चमक, पेड़ों की चोटियों पर नाचती किरणें, मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा और इंद्रधनुषी पंखों वाले पक्षी—ये सब मिलकर भारत को एक स्वर्ग के समान सुंदर देश बनाते हैं।
प्रश्न 6: 'कार्नेलिया का गीत' कविता का मुख्य संदेश या मूल भाव क्या है?
उत्तर: इस कविता का मूल भाव देशप्रेम और गौरवगान है। प्रसाद जी ने इसके माध्यम से भारत की संस्कृति, महानता, यहाँ के लोगों की करुणा और प्राकृतिक वैभव को वैश्विक स्तर पर सराहा है। यह गीत हमें अपनी विरासत पर गर्व करना सिखाता है। 


देवसेना का गीत पाठ के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें -

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28 अप्रैल 2024

अप्रैल 28, 2024

हिंदी साहित्य - अलंकार के भेद ,परिभाषा -

 हिंदी साहित्य - अलंकार के भेद ,परिभाषा ।  alankar ke bhed , paribhasha 


हिंदी साहित्य में अलंकार एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। अलंकार के भेद परिभाषा की जानकारी आज हम इस लेख के माध्यम से प्राप्त करेंगे। अलंकार काव्य शास्त्र का विषय है।

अलंकार की परिभाषा -  alankar ki paribhasha 

         अलंकार शब्द का शाब्दिक अर्थ आभूषण होता है। अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना है। अलम् तथा कार। यहां अलम्  का अर्थ ' शोभा ' तथा कार का अर्थ है ' करने वाला '। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले कारकों  को अलंकार कहते हैं।

21 अप्रैल 2024

अप्रैल 21, 2024

TEACHERS HELP - Rajgktopic

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नमस्कार मित्रों ,
                  Rajasthan Teachers Help पोस्ट में आपका स्वागत है । इस पोस्ट में आप सभी के लिए काम आने वाले विभिन्न लॉगिन लिंक शेयर  किए जा रहे हैं। यदि आप अलग -अलग वैबसाइट पर जाकर अपने कार्य को पूरा करने में असुविधा महसूस कर रहे हैं तो यह पोस्ट आपको बहुत काम आ सकती है ।

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18 सित॰ 2021

सितंबर 18, 2021

Rajasthan REET 26 November 2021 Special Question

 Rajasthan REET 26 November 2021 Special Question -  

राजस्थान REET  रीट 2021 में आये हुए प्रश्नों  से संबंधित प्रश्न उत्तर की  जानकारी दी जा  रही है -

राजस्थान REET 2021Answer Key

Rajasthan-REET-2021-Answer-Key
राजस्थान REET 2021 Answer Key 


👉राजस्थान की किस जनजाति को भारत सरकार  द्वारा आदिम जनजाति समूह की सूची में शामिल किया गया है ?
सहरिया जनजाति । 

👉राजस्थान के किस क्रांतकारी को तिहाड़ जेल में रखा गया था ?
    गोपाल सिंह खरवा को। 

👉 राजस्थान का पहला भालू अभयारण्य कहाँ स्थापित किया जाएगा ?
उत्तर - जालौर ( सुंधा माता क्षेत्र में )

💗 टोक्यो पैरा - ओलम्पिक 2021 में राजस्थान के पदक विजेता खिलाड़ी 
- ( Tokyo olympics 2021 Rajasthan )

👉 स्वर्ण पदक विजेता - 10 मीटर एयर राइफल में - शूटर अवनि लेखरा (AVANI LEKHARA ) पैरा ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जितने वाली प्रथम भारतीय महिला है।

👉 राजस्थान राज्य सहकारी बैंक का मुख्यालय कहाँ स्थित है -
       जयपुर 

👉 हमारे देश का केंद्रीय बैंक कौन सा है -
      भारतीय रिजर्व बैंक। 

👉  जिला स्तर पर उपभोक्ता विवादों का निपटारा  कौन करता है -

        जिला फोरम। 

👉रजत पदक विजेता - जेवलिन थ्रोअर देवेन्द्र झाझड़िया (DEVENDRA JHAJARIA )


👉 कांस्य पदक विजेता - जेवलिन थ्रोअर सुन्दर गुर्जर (SUNDER GURJAR )

👉मुख्यमंत्री किसान मित्र ऊर्जा योजना का शुभारंभ कब किया गया ?

17 जुलाई 2021 

👉 राजस्थान में  जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा का  आयोजन कब किया गया ?

11 july से 24 july 2021 तक