कार्नेलिया का गीत -
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक 'चंद्रगुप्त' का प्रसिद्ध अंश 'कार्नेलिया का गीत' भारत की गौरवगाथा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्रण है। इसकी सप्रसंग व्याख्या नीचे दी गई है:
1. संदर्भ
यह काव्यांश छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त' से उद्धृत है। यह कविता कक्षा 12 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' में संकलित है।
2. प्रसंग
सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के तट पर यूनानी शिविर के पास बैठी है। वह भारत की प्राकृतिक सुंदरता, यहाँ की संस्कृति और लोगों की उदारता से इतनी प्रभावित है कि वह भारत को अपना देश मानने लगती है और उसकी प्रशंसा में यह गीत गाती है।
3. व्याख्या
अरुण यह मधुमय देश हमारा: कार्नेलिया कहती है कि हमारा भारत देश लालिमा (सूर्योदय) से भरा हुआ और अत्यंत मधुर है। यहाँ सूर्य की पहली किरण पहुँचती है, जो ज्ञान और सभ्यता का प्रतीक है।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा: भारत की विशालता और उदारता ऐसी है कि यहाँ दूर-देश से आए अनजान लोगों और शरणार्थियों को भी प्रेमपूर्वक आश्रय मिलता है।
सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर: सुबह के समय तालाबों में खिले कमलों की चमक और पेड़ों की फुनगियों (ऊपरी शाखाओं) पर नाचती हुई सूर्य की किरणें अत्यंत मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करती हैं।
लघु सुरधनु से पंख पसारे... उड़ते खग जिस ओर मुँह किए: रंग-बिरंगे पक्षी अपने छोटे-छोटे इंद्रधनुषी पंख फैलाकर मलय पर्वत से आने वाली शीतल सुगंधित हवा के सहारे जिस ओर उड़ रहे हैं, वे भारत को ही अपना प्यारा घोंसला (घर) समझते हैं।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल: भारत के लोगों के हृदय करुणा और सहानुभूति से भरे हैं। दूसरों के दुख को देखकर उनकी आँखों से आँसू इस तरह बहते हैं जैसे बादल से वर्षा होती है।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे: सुबह के समय 'उषा' रूपी नायिका सूर्य रूपी सुनहरे कलश में सुख और समृद्धि भरकर भारत की धरती पर बिखेर देती है, जिससे चारों ओर प्रसन्नता छा जाती है।
मदिर ऊँघते रहते जब जगकर, रजनी भर तारा: रात भर जागने के बाद सुबह होने पर तारे ऐसे लगते हैं जैसे वे अब नींद में ऊँघ रहे हों, और विदा ले रहे हों।
4. काव्य सौंदर्य (विशेष)
भाषा: तत्सम प्रधान खड़ी बोली, जो सरल और प्रवाहमयी है।
शैली: गेय शैली (गाया जाने योग्य गीत)।
अलंकार: 'उषा' का मानवीकरण किया गया है (मानवीकरण अलंकार)। 'लघु सुरधनु' में उपमा अलंकार है।
भाव: राष्ट्रप्रेम, शरणागत वत्सलता और प्रकृति के प्रति अनुराग झलकता है।
दूसरे शब्दों में कार्नेलिया का गीत पाठ का सार -
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'कार्नेलिया का गीत' की संपूर्ण व्याख्या, व्यवस्थित रूप में यहाँ दी गई है:
1. कविता (मूल पाठ)
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की, पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब जगकर, रजनी भर तारा।
2. प्रसंग
प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त' से ली गई हैं। सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे बैठी है। वह भारत की अनुपम प्राकृतिक छटा, यहाँ की गौरवशाली संस्कृति और उदार मानवीय मूल्यों को देखकर मंत्रमुग्ध है और इसी भाव में यह गीत गाती है।
3. संपूर्ण व्याख्या
भारत की उदारता: कार्नेलिया कहती है कि हमारा भारत देश सूर्य की लालिमा (ज्ञान) से भरा हुआ और अत्यंत मधुर है। इस देश की विशेषता यह है कि यहाँ दूर-देश से आने वाले अनजान यात्रियों और शरणार्थियों को भी प्रेमपूर्वक आश्रय मिलता है। जिस तरह क्षितिज का अंत नहीं मिलता, वैसे ही भटकते हुए लोगों को भारत में आकर शांति मिलती है।
प्राकृतिक सौंदर्य: सुबह के समय तालाबों में खिले हुए कमलों की पराग रूपी चमक पर पेड़ों की चोटियाँ नाचती हुई प्रतीत होती हैं। धरती पर चारों ओर फैली हरियाली ऐसी लगती है मानो किसी ने शुभ कुंकुम (रोली) बिखेर दिया हो, जो जीवन में मंगल का प्रतीक है।
अतिथि सत्कार और अपनत्व: छोटे-छोटे इंद्रधनुषी पंख फैलाकर पक्षी मलय पर्वत से आने वाली शीतल सुगंधित हवा के सहारे जिस दिशा में उड़ रहे हैं, वह भारत ही है। वे पक्षी भी भारत को अपना प्यारा घोंसला (घर) मानकर यहाँ खिंचे चले आते हैं। यह संकेत है कि विदेशी भी यहाँ आकर बसना चाहते हैं।
करुणा और सहानुभूति: यहाँ के लोगों के हृदय करुणा से भरे हैं। दूसरों के दुखों को देखकर उनकी आँखों में करुणा के वैसे ही बादल उमड़ पड़ते हैं जैसे बारिश की बूंदें गिरती हैं। यहाँ तक कि समुद्र की अनंत लहरें भी भारत के किनारों से टकराकर शांत हो जाती हैं, अर्थात यहाँ सबको शांति और स्थिरता मिलती है।
मनोहारी सुबह: सुबह के समय जब आकाश में तारे रात भर जागने के बाद आलस में ऊँघने लगते हैं, तब 'उषा' (भोर) रूपी नायिका सूर्य रूपी सुनहरे कलश (हेम कुंभ) में सुख-समृद्धि भरकर भारत की धरती पर लुढ़का देती है। आशय यह है कि भारत में हर सुबह सुख और आनंद लेकर आती है।
4. विशेष (काव्य सौंदर्य)
भाषा: संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है, जो अत्यंत प्रवाहपूर्ण है।
मानवीकरण अलंकार: 'उषा' को नायिका के रूप में और 'तारा' को ऊँघते हुए दिखाकर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
रूपक और उपमा: 'हेम कुंभ' (सुनहरा घड़ा) में रूपक और 'लघु सुरधनु से पंख' में उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
बिंब विधान: कवि ने दृश्य बिंबों के माध्यम से प्रकृति का सजीव चित्र खींचा है।
राष्ट्रीय भावना: यह गीत भारत की विश्व-बंधुत्व की भावना और उदारता का परिचय देता है।
पाठ 'कार्नेलिया का गीत' पर आधारित महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर नीचे दिए गए हैं:
उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से भारत की निम्नलिखित विशेषताओं को बताया गया है:
- प्राकृतिक सौंदर्य: भारत का सूर्योदय अत्यंत सुंदर और लालिमा (अरुण) से भरा है।
- मिठास और अपनापन: यहाँ की संस्कृति और व्यवहार में मधुरता (मधुमय) है।
- ज्ञान का प्रतीक: सूर्य की पहली किरण यहीं आती है, जो भारत को ज्ञान का केंद्र बताती है।
उत्तर:
- उड़ते खग: यहाँ पक्षी उन विदेशी लोगों के प्रतीक हैं जो शांति और प्रेम की तलाश में भारत आते हैं और इसे अपना घर (नीड़) मानते हैं।
- बरसाती आँखों के बादल: इसका अर्थ है कि भारत के लोग दूसरों के कष्टों को देखकर दुखी हो जाते हैं। उनकी आँखों में करुणा का जल रहता है, जो उन्हें संवेदनशील बनाता है।
उत्तर: इस पंक्ति का भाव यह है कि भारत एक अत्यंत उदार देश है। यहाँ केवल जान-पहचान वालों को ही नहीं, बल्कि उन अनजान लोगों को भी आश्रय और सहारा दिया जाता है जिन्हें दुनिया में कहीं और जगह नहीं मिलती। यह भारत की 'अतिथि देवो भव:' की भावना को दर्शाता है।
उत्तर: कवि ने उषा (भोर) का मानवीकरण किया है। यहाँ सूर्य को 'सुनहरा घड़ा' (हेम कुंभ) कहा गया है। जैसे कोई स्त्री घड़े से पानी छिड़कती है, वैसे ही उषा रूपी नायिका सूर्य की सुनहरी किरणों के माध्यम से भारत की धरती पर सुख और समृद्धि बिखेर देती है।
उत्तर: कविता में प्रकृति का अत्यंत मनमोहक चित्रण है। सुबह के समय कमलों पर सूर्य की चमक, पेड़ों की चोटियों पर नाचती किरणें, मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा और इंद्रधनुषी पंखों वाले पक्षी—ये सब मिलकर भारत को एक स्वर्ग के समान सुंदर देश बनाते हैं।
उत्तर: इस कविता का मूल भाव देशप्रेम और गौरवगान है। प्रसाद जी ने इसके माध्यम से भारत की संस्कृति, महानता, यहाँ के लोगों की करुणा और प्राकृतिक वैभव को वैश्विक स्तर पर सराहा है। यह गीत हमें अपनी विरासत पर गर्व करना सिखाता है।
